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डब्ल्यूआईआई की 37वीं वार्षिक अनुसंधान संगोष्ठी शुरू, वन्यजीव संरक्षण पर विशेषज्ञों ने किया मंथन।

उत्तराखण्ड

डब्ल्यूआईआई की 37वीं वार्षिक अनुसंधान संगोष्ठी शुरू, वन्यजीव संरक्षण पर विशेषज्ञों ने किया मंथन।

संवादसूत्र देहरादून: भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के देहरादून परिसर में सोमवार को 37वीं वार्षिक अनुसंधान संगोष्ठी-2026 का शुभारंभ हुआ। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तत्वावधान में 21 और 22 सितंबर को आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में देशभर के शोधकर्ता, वन्यजीव विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, शिक्षाविद और संरक्षण विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं। संगोष्ठी में वन्यजीव विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे शोध को साझा करने के साथ जैव विविधता संरक्षण और प्रबंधन से जुड़ी समकालीन चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।

1986 में स्थापना के बाद से वार्षिक अनुसंधान संगोष्ठी डब्ल्यूआईआई के शोध कार्यों को प्रस्तुत करने, वैज्ञानिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने और वन्यजीव संरक्षण एवं प्रबंधन के क्षेत्र में सहयोग मजबूत करने का महत्वपूर्ण मंच रही है। इसमें शोधकर्ता, संकाय सदस्य, विद्यार्थी और अन्य हितधारक अपने शोध निष्कर्ष और अनुभव साझा करते हैं।

उद्घाटन सत्र में डब्ल्यूआईआई की डीन, फैकल्टी ऑफ वाइल्डलाइफ साइंसेज डॉ. रुचि बडोला और निदेशक डॉ. जी.एस. भारद्वाज ने स्वागत संबोधन किया। इसके बाद इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस (आईबीसीए) के महानिदेशक डॉ. एस.पी. यादव ने संबोधित किया।

कई नई प्रजातियों की खोज

डॉ. रुचि बडोला ने संस्थान की पिछले एक वर्ष की प्रमुख अनुसंधान उपलब्धियों की जानकारी देते हुए बताया कि डब्ल्यूआईआई के वैज्ञानिकों ने दो नई प्रजातियों, बुश फ्रॉग की 13 नई प्रजातियों और भारत में पहली मड-नेस्टिंग मेंढक प्रजाति की खोज की है। उन्होंने बताया कि संस्थान विकसित भारत-2047 के लिए वन्यजीव विजन प्लान तैयार करने की दिशा में भी कार्य कर रहा है।

उद्घाटन सत्र में डब्ल्यूआईआई के संकाय सदस्यों और शोधकर्ताओं द्वारा तैयार पांच प्रकाशनों का विमोचन किया गया। इनमें ‘रिवर रिदम: लर्निंग बाय डूइंग मेथड्स’, ‘एक्सपीरिएंशिया: ए बुक ऑन एक्सपेरिमेंटल लर्निंग-बियॉन्ड क्लासरूम्स’, ‘ए फील्ड गाइड टू द टाइगर बीटल्स ऑफ रामगंगा कैचमेंट’, ‘स्टेटस ऑफ द क्लाउडेड लेपर्ड इन सेलेक्ट साइट्स ऑफ नॉर्थईस्टर्न इंडिया 2026’ और ‘पैन-इंडिया असेसमेंट ऑफ एंडेंजर्ड स्पीशीज-निकोबार मेगापोड’ शामिल हैं।

संरक्षण की नई चुनौतियों पर चर्चा

संगोष्ठी की अध्यक्षता डब्ल्यूआईआई के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ वन्यजीव वैज्ञानिक डॉ. जी.एस. रावत ने की। उन्होंने युवा वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और पीजी डिप्लोमा प्रशिक्षु अधिकारियों से संगोष्ठी में सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया। उन्होंने वन्यजीव संरक्षण की नीतियों और पद्धतियों को आकार देने में शोधकर्ताओं की भूमिका पर भी प्रकाश डाला।

संगोष्ठी में विशेषज्ञों की अध्यक्षता में विभिन्न तकनीकी सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। इनमें प्रजातियों की रिकवरी और पुनर्प्रवेश, आबादी की लचीलापन क्षमता, आवास एवं उभरती संरक्षण चुनौतियां, लैंडस्केप परिवर्तन, कनेक्टिविटी और विकास, आबादी आकलन, पर्यावरणीय बदलावों के बीच जैव विविधता तथा मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व और संघर्ष जैसे विषय शामिल हैं।

वन्यजीव अनुसंधान में सहयोग के लिए भारतीय नौसेना और भारतीय वायु सेना के अधिकारियों विंग कमांडर अमरदीप कौर, लेफ्टिनेंट कमांडर प्रतीक और लेफ्टिनेंट कमांडर जीतू सिंह को सम्मानित किया गया।

डब्ल्यूआईआई निदेशक डॉ. जी.एस. भारद्वाज ने कहा कि वार्षिक अनुसंधान संगोष्ठी देश की समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण के लिए संस्थान द्वारा किए जा रहे प्रयासों को सामने लाने का महत्वपूर्ण मंच है। उन्होंने कहा कि संवाद के माध्यम से शोध कार्यों की गुणवत्ता, प्रासंगिकता, दायरे और वैज्ञानिक कठोरता को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।

उन्होंने आवासों के सिकुड़ने और बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष को प्रमुख चुनौतियों में शामिल बताया। उन्होंने कहा कि डब्ल्यूआईआई देश के विभिन्न हिस्सों में वन्यजीव अनुसंधान और संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहा है तथा संस्थान का अधिकांश शोध क्षेत्र आधारित और कार्यान्वयन योग्य है।

मुख्य अतिथि डॉ. एस.पी. यादव ने डब्ल्यूआईआई को वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में अग्रणी संस्थान बताते हुए कहा कि विकसित भारत-2047 के विजन में वन्यजीव संरक्षण महत्वपूर्ण घटक होगा। उन्होंने वन्यजीव संरक्षण और अनुसंधान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भविष्य की भूमिका पर भी जोर दिया। मानव-वन्यजीव संघर्ष, आवासों का क्षरण और उभरती संरक्षण चुनौतियों पर भी उन्होंने विचार साझा किए।

अनुसंधान समन्वयक डॉ. बिभाष पांडव ने कहा कि संगोष्ठी में प्रस्तुत शोध संस्थान के अकादमिक और अनुसंधान समुदाय के समर्पण और विविधता को दर्शाता है। उन्होंने संरक्षण विज्ञान में पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों के साथ जोड़ने, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और उभरती प्रौद्योगिकियों के उपयोग को महत्वपूर्ण बताया।

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