उत्तराखण्ड
हिमालय में बढ़ती गर्मी बढ़ा रही खतरे की दस्तक, 3,000 मीटर से ऊपर तेजी से बदल रहा मौसम।

संवादसूत्र देहरादून। हिमालय अब केवल बर्फ और ठंड का पर्याय नहीं रह गया है। पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान बढ़ने के साथ हिमालय की जल और मौसम व्यवस्था में भी तेजी से बदलाव हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार इसका सबसे स्पष्ट असर 3,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है, जहां बर्फ के टिके रहने की अवधि लगातार कम हो रही है।
आईआईटी रुड़की में इंटरनेशनल सेंटर फॉर एक्सीलेंस इन डैम्स के संयुक्त संकाय सदस्य प्रो. अंकित अग्रवाल के विश्लेषण के अनुसार ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान में असामान्य वृद्धि को ‘ऊंचाई-निर्भर तापन’ कहा जाता है। इसका सीधा असर हिमनदों और बर्फ पर पड़ रहा है।
जम्मू-कश्मीर के ऊंचाई वाले क्षेत्रों के मौसम केंद्रों के अध्ययन में भी गर्मी बढ़ने का रुझान सामने आया है। पहलगाम और गुलमर्ग जैसे पर्वतीय इलाकों में करीब दो दशकों के दौरान तापमान में लगभग एक डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि दर्ज की गई है। कई पर्वतीय क्षेत्रों में रात का न्यूनतम तापमान भी दिन के अधिकतम तापमान की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है।
बर्फ घटने से बढ़ेगी गर्मी
प्रो. अग्रवाल के मुताबिक बर्फ की सफेद सतह सूर्य की किरणों का बड़ा हिस्सा वापस लौटा देती है, लेकिन बर्फ हटने के बाद चट्टान और मिट्टी अधिक सौर ऊर्जा अवशोषित करती हैं। इससे सतह गर्म होती है और बची हुई बर्फ तेजी से पिघलती है। यानी बर्फ कम होने से गर्मी बढ़ती है और गर्मी बढ़ने से बर्फ के पिघलने की रफ्तार और तेज होती है।
इस बदलाव का असर केवल हिमनदों तक सीमित नहीं है, बल्कि हिमालयी नदियों, जल स्रोतों और पर्वतीय पारिस्थितिकी पर भी पड़ सकता है।
अब बारिश की मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी रफ्तार
2013 की केदारनाथ आपदा, हिमाचल प्रदेश की 2023 की विनाशकारी बाढ़ और अगस्त 2025 में उत्तरकाशी के धराली में सामने आए मलबे के प्रवाह जैसी घटनाओं ने हिमालयी क्षेत्रों में अचानक आने वाली तीव्र मौसम घटनाओं के खतरे को उजागर किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब किसी क्षेत्र में कुल कितनी बारिश हुई, इसके साथ यह जानना भी जरूरी है कि बारिश किस घाटी में हुई, कितने कम समय में हुई और उससे नीचे स्थित कौन-सी बस्ती, सड़क, पुल या नदी प्रभावित हो सकती है।
इसके लिए ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौसम निगरानी केंद्रों का नेटवर्क बढ़ाने, हिमनद झीलों की लगातार निगरानी करने और संवेदनशील बस्तियों को जोखिम के आधार पर चिह्नित करने की आवश्यकता है।
बढ़ता हिमालयी तापमान केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं है। इसका सीधा संबंध पानी, खेती, सड़क, पर्यटन और पर्वतीय आबादी की सुरक्षा से है। ऐसे में बदलते हिमालय को समझने और उसके अनुरूप आपदा प्रबंधन तथा विकास की रणनीति तैयार करना अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।




