उत्तराखण्ड
विकसित किफायती रेशम कीटपालन तकनीक का यूपी के रेशम निदेशक ने किया अवलोकन।



संवादसूत्र देहरादून। उत्तर प्रदेश के रेशम निदेशक आनंद कुमार शुक्ला ने शुक्रवार को केंद्रीय रेशम बोर्ड, वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत सहसपुर स्थित क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान केंद्र का तकनीकी भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने केंद्र में संचालित अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों, आधुनिक रेशम उत्पादन तकनीकों और किसानों की आय बढ़ाने के लिए विकसित किए जा रहे नवाचारों का अवलोकन किया।
भ्रमण के दौरान केंद्रीय रेशम बोर्ड और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के सहयोग से विकसित आदर्श एवं वहनीय रेशम कीटपालन गृह प्रमुख आकर्षण रहा। केंद्र प्रभारी एवं वैज्ञानिक-डी डॉ. पवन सैनी ने बताया कि इस कीटपालन गृह में लगभग 100 डीएफएल (डिजीज फ्री लेइंग्स) के पालन की क्षमता है। इस संरचना को वैज्ञानिक रूप से अनुकूल परिस्थितियों में रेशमकीट पालन को बढ़ावा देने के साथ ही रेशम उत्पादकों के लिए किफायती और व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विकसित किया गया है।
उन्होंने बताया कि इस नवीन कीटपालन गृह में शरद ऋतु के दौरान रेशमकीट पालन का सफल परीक्षण किया जा चुका है। इससे विभिन्न मौसमी परिस्थितियों में इस संरचना की उपयोगिता और तकनीकी व्यवहार्यता का आकलन किया गया है।
राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे होगा शहतूत वृक्षारोपण
तकनीकी भ्रमण के दौरान केंद्र प्रभारी ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के सहयोग से संचालित शहतूत वृक्षारोपण परियोजना की जानकारी भी दी। इस परियोजना के तहत राष्ट्रीय राजमार्ग-72ए/73 (रुड़की), राष्ट्रीय राजमार्ग-74 (नजीबाबाद) और राष्ट्रीय राजमार्ग-125 (सितारगंज-खटीमा) के तीन खंडों में शहतूत वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य शहतूत आधारित रेशम उत्पादन की संभावनाओं का विस्तार करना है।
एक ही खेत से कृषि और रेशम उत्पादन के दोहरे लाभ
केंद्र द्वारा विकसित कृषि आधारित शहतूत वृक्षारोपण मॉडल के बारे में भी आनंद कुमार शुक्ला को जानकारी दी गई। इस मॉडल में शहतूत के पौधों की कतारों के बीच उपलब्ध भूमि पर उपयुक्त कृषि फसलों की अंतःफसली खेती की जाती है। इससे किसान शहतूत की पत्तियों के उत्पादन के साथ अन्य फसलों से भी आय अर्जित कर सकते हैं।
यह मॉडल विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। इसके माध्यम से भूमि और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग, फसल विविधीकरण तथा कृषि आधारित आजीविका को बढ़ावा देने की संभावनाएं विकसित होती हैं।
रेशम संग्रहालय का भी किया अवलोकन
भ्रमण के दौरान उत्तर प्रदेश के रेशम निदेशक ने केंद्र परिसर में स्थापित रेशम संग्रहालय का भी अवलोकन किया। यहां रेशम उत्पादन से जुड़ी विभिन्न तकनीकों, उपकरणों और रेशम उद्योग की गतिविधियों को प्रदर्शित किया गया है। उन्हें केंद्र की ओर से वैज्ञानिक रेशम उत्पादन पद्धतियों के प्रसार के लिए संचालित विस्तार एवं संचार कार्यक्रमों की जानकारी भी दी गई।
आनंद कुमार शुक्ला ने केंद्र द्वारा विकसित तकनीकों और व्यावहारिक नवाचारों की सराहना की। यह भ्रमण अनुसंधान संस्थानों और रेशम उत्पादन से जुड़े विभागों के बीच तकनीकी सहयोग तथा उन्नत एवं किफायती रेशमकीट पालन तकनीकों के प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण रहा।



