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विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय से ही मजबूत होगा आपदा प्रबंधन: ले. कर्नल भण्डारी।

उत्तराखण्ड

विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय से ही मजबूत होगा आपदा प्रबंधन: ले. कर्नल भण्डारी।

संवादसूत्र देहरादून: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआईडीएम), गृह मंत्रालय और उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) के संयुक्त तत्वावधान में मानसून पूर्व तैयारियों पर केंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का गुरुवार को यूएसडीएमए भवन में शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम में विभिन्न विभागों, जिला प्रशासन, आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों तथा तकनीकी विशेषज्ञों ने भाग लिया।

राज्य आपदा प्रबंधन सलाहकार समिति के उपाध्यक्ष लेफ्टिनेंट कर्नल रघुवीर सिंह भण्डारी (सेवानिवृत्त) ने कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए कहा कि आपदा प्रबंधन केवल सरकारी तंत्र की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक को इसके लिए प्रशिक्षित और सक्षम बनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक पद्धतियों के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण और उपयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का वर्षों का अनुभव मौसम, भू-संरचना और प्राकृतिक संकेतों को समझने में मददगार रहा है, जो कई बार संभावित आपदाओं के पूर्व आकलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने ग्राम स्तर पर आपदा जोखिम न्यूनीकरण गतिविधियों को मजबूत करने तथा ग्राम प्रधानों, स्वयं सहायता समूहों, युवक एवं महिला मंगल दलों और स्वयंसेवी संगठनों की सक्रिय भागीदारी पर बल दिया।

अपने सैन्य अनुभवों का उल्लेख करते हुए ले. कर्नल भण्डारी ने कहा कि उत्तराखण्ड में बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक निवास करते हैं, जिनका अनुशासन, नेतृत्व क्षमता और आपात परिस्थितियों में कार्य करने का अनुभव आपदा प्रबंधन में उपयोगी साबित हो सकता है।

सचिव, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास श्री विनोद कुमार सुमन ने कहा कि प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य विभिन्न विभागों के बीच समन्वय को सुदृढ़ बनाना तथा अधिकारियों को आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में हो रहे नवीनतम नवाचारों और सर्वोत्तम प्रथाओं से अवगत कराना है। उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन एक बहु-विभागीय विषय है, इसलिए सभी विभागों के बीच स्पष्ट संवाद और जिम्मेदारियों की स्पष्ट समझ आवश्यक है।

अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (प्रशासन) श्री प्रकाश चंद्र ने बताया कि दो दिवसीय प्रशिक्षण में अर्ली वार्निंग सिस्टम, जोखिम मूल्यांकन, बाढ़ प्रबंधन, शहरी बाढ़ की चुनौतियां, संवेदनशील समुदायों की सुरक्षा, इंसिडेंट रिस्पॉन्स सिस्टम, निकासी योजना, स्वास्थ्य क्षेत्र की तैयारी, जलवायु परिवर्तन जनित जोखिम और उभरती तकनीकों के उपयोग जैसे विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा व्याख्यान दिए जाएंगे।

अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (क्रियान्वयन) एवं डीआईजी श्री राजकुमार नेगी ने बताया कि मानसून को देखते हुए यूएसडीएमए सभी जनपदों और रेखीय विभागों के साथ लगातार समन्वय बनाए हुए है तथा संवेदनशील क्षेत्रों की विशेष निगरानी की जा रही है।

संवेदनशील स्थानों को बनाया जाए ‘नो सेल्फी जोन’

कार्यक्रम के दौरान सचिव विनोद कुमार सुमन ने नदी-नालों, झरनों और गहरी खाइयों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में रील्स और सेल्फी बनाने के बढ़ते चलन पर चिंता जताई। उन्होंने जिलों को ऐसे दुर्घटना संभावित स्थलों की पहचान कर उन्हें ‘नो सेल्फी जोन’ घोषित करने, चेतावनी बोर्ड लगाने और सुरक्षा प्रबंध सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। साथ ही सुरक्षित स्थानों को ‘सेल्फी सेफ जोन’ के रूप में विकसित करने का सुझाव भी दिया।

अर्ली वार्निंग सिस्टम पर विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव

एनआईडीएम के प्रोफेसर डॉ. नवनीत कुमार ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों में वृद्धि हुई है। उन्होंने सैटेलाइट आधारित रिमोट सेंसिंग तकनीक और अर्ली वार्निंग सिस्टम की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि समय पर मिलने वाली चेतावनियां जनहानि और संपत्ति के नुकसान को काफी हद तक कम कर सकती हैं। उन्होंने प्रतिभागियों को सचेत ऐप, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की रियल टाइम मौसम सूचना सेवाओं और दामिनी ऐप के बारे में जानकारी दी।

यूएलएमएमसी के निदेशक डॉ. शांतनु सरकार ने भूस्खलन न्यूनीकरण और पूर्वानुमान से जुड़े प्रयासों की जानकारी देते हुए कहा कि विभिन्न संस्थान इस दिशा में कार्य कर रहे हैं और निकट भविष्य में सकारात्मक परिणाम सामने आने की उम्मीद है।

कार्यक्रम में प्रो. नवनीत कुमार, मो. ओबैदुल्लाह अंसारी, रोहित कुमार, डॉ. शांतनु सरकार सहित सेना, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, पुलिस तथा अन्य विभागों के अधिकारी एवं विशेषज्ञ उपस्थित रहे। :::

यह संस्करण समाचार-पत्र शैली में संक्षिप्त, संतुलित और प्रकाशन योग्य रूप में तैयार किया गया है।

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