उत्तराखण्ड
उत्तराखंड मॉडल’ की गूंज: बंगाल-असम की जीत में यूसीसी बना बड़ा चुनावी मुद्दा।

संवादसूत्र देहरादून: पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव परिणामों के बाद राजनीतिक गलियारों में “उत्तराखंड मॉडल” की चर्चा तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (भारतीय जनता पार्टी) ने अपने चुनावी घोषणा पत्रों में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को प्रमुखता से शामिल किया, जो पहले उत्तराखंड में लागू की जा चुकी है।
दरअसल, समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) को लेकर लंबे समय से देश में बहस चलती रही है। आजादी के बाद से ही यह मुद्दा राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा रहा, लेकिन इसे लागू करने की दिशा में ठोस कदम उत्तराखंड सरकार ने उठाया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य में जनवरी 2025 से यूसीसी लागू किया गया।
यूसीसी के तहत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशन जैसे मामलों को एक समान कानूनी ढांचे में लाने का प्रयास किया गया है। भाजपा इसे महिला अधिकार, समानता और न्याय के मुद्दे से जोड़कर प्रचारित कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल (पश्चिम बंगाल) और असम (असम) में यूसीसी को चुनावी एजेंडे में शामिल करने से शहरी मतदाताओं, महिलाओं और युवाओं के बीच चर्चा बढ़ी। हालांकि, चुनावी जीत के कारणों में कई अन्य स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दे भी शामिल होते हैं, इसलिए केवल यूसीसी को निर्णायक कारक मानना एकतरफा आकलन हो सकता है।
भाजपा पहले ही अनुच्छेद 370 और राम मंदिर जैसे मुद्दों को पूरा कर चुकी है और अब यूसीसी को अपने अगले बड़े वैचारिक एजेंडे के रूप में आगे बढ़ा रही है।
उत्तराखंड के बाद अब गुजरात में भी यूसीसी लागू करने की दिशा में पहल की जा रही है। वहां गठित समिति अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप चुकी है, जिसका मसौदा काफी हद तक उत्तराखंड मॉडल से प्रभावित बताया जा रहा है।
इस पूरे परिदृश्य में “उत्तराखंड मॉडल” को भाजपा एक उदाहरण के रूप में पेश कर रही है, जबकि विपक्षी दल इस पर अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं। ऐसे में आने वाले समय में यूसीसी राष्ट्रीय राजनीति का एक प्रमुख मुद्दा बना रह सकता है।




