उत्तराखण्ड
राष्ट्रीय वानिकी कार्यशाला: सैटेलाइट निगरानी से मजबूत होगा वन प्रबंधन, सतत जैव-अर्थव्यवस्था पर जोर।

संवादसूत्र देहरादून: भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद में आयोजित “सतत वन-आधारित जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने: मुद्दे और चुनौतियाँ” विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का सफल समापन हुआ। इस कार्यशाला में नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों, उद्योग प्रतिनिधियों और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने भाग लेकर वन क्षेत्र के भविष्य पर व्यापक मंथन किया।
कार्यशाला का उद्घाटन केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि वन संरक्षण केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा इसका अहम हिस्सा है।
कार्यशाला में एक महत्वपूर्ण सुझाव के रूप में राष्ट्रीय वानिकी कार्यक्रमों में उपग्रह-आधारित वन निगरानी प्रणाली को शामिल करने पर जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि रिमोट सेंसिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग आधारित तकनीकों को जमीनी आंकड़ों के साथ जोड़कर एक मजबूत भू-स्थानिक ढांचा तैयार किया जाए, जिससे वास्तविक समय में साक्ष्य-आधारित निर्णय लिए जा सकें।
चर्चा के दौरान चार प्रमुख विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया, जिनमें सतत संसाधन-आधारित जैव-अर्थव्यवस्था, वन-आधारित उद्योगों का विकास, जलवायु परिवर्तन शमन में वनों की भूमिका तथा वन एवं वन्यजीव-आधारित आजीविका शामिल रही।
कार्यशाला में सामुदायिक भागीदारी को वन संरक्षण और आजीविका सृजन का महत्वपूर्ण आधार बताया गया। विशेषज्ञों ने इको-टूरिज्म, प्रकृति-आधारित उद्यम और वन्यजीव-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने की सिफारिश की, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने के साथ स्थानीय लोगों की आय बढ़ाई जा सके।
कार्यक्रम के अंत में इस बात पर सहमति बनी कि सतत वन-आधारित जैव-अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए तकनीक, संस्थागत सहयोग और समुदाय की सक्रिय भागीदारी को एक साथ लेकर चलना होगा।




