आलेख
हरेला…
【राघवेन्द्र चतुर्वेदी】
हरेला का मतलब सिर्फ हरियाली नहीं है। इसका मतलब है इंतज़ार, परिश्रम, धैर्य, और फिर उसमें उपजा विश्वास। ये कोई बाजार में खरीदा जाने वाला त्यौहार नहीं है, ये घर की रसोई में, आंगन की दीवार पर, छत के गमले में, और मां के मन में उगता है।

एक पर्व नहीं, बल्कि एक एहसास है जीवन को जीने की सबसे बुनियादी, सबसे सच्ची वजह का। पहाड़ की छांव में पले-बढ़े लोग जानते हैं कि यह त्यौहार खेतों का नहीं, दिलों का होता है। यह बीज से जन्म की नहीं, विश्वास से जीवन की शुरुआत है। जब मिट्टी की अंजुरी में नौ बीजों को बोया जाता है, तो लगता है जैसे पुरखों की कोई गुप्त भाषा फिर से फूटने लगी हो जो कहती है कि जब तक धरती हरी है, इंसान जिंदा है।
हरेला का मतलब सिर्फ हरियाली नहीं है। इसका मतलब है इंतज़ार, परिश्रम, धैर्य, और फिर उसमें उपजा विश्वास। ये कोई बाजार में खरीदा जाने वाला त्यौहार नहीं है, ये घर की रसोई में, आंगन की दीवार पर, छत के गमले में, और मां के मन में उगता है।
जब घर की सबसे बड़ी स्त्री नौ बीज चुनती है, उन्हें धोती है, सुखाती है, और थाली में बोती है तो वह सिर्फ परंपरा का निर्वाह नहीं कर रही होती, वह एक जीवन दर्शन रच रही होती है। हरेला उगता है, लेकिन उसके साथ-साथ एक उम्मीद भी उगती है कि आने वाला वर्ष समृद्ध होगा, कि घर में सुख-शांति रहेगी, कि बच्चे फलेंगे-फूलेंगे, कि इस बार जो बोया है, वह कटेगा भी और खाया भी जाएगा।
पांच-सात दिन में जब वह नन्हा-सा हरा तिनका निकलता है, तो लगता है जैसे जीवन की थकी हुई देह में फिर से हरियाली उतर आई हो। कोई आस्था फिर से अंकुरित हो गई हो। वह तिनका कोई सजावट की वस्तु नहीं, एक बहुत कोमल मगर ठोस आश्वासन है कि जीवन कभी पूरी तरह बंजर नहीं होता।
मां जब हरेले को बच्चों के सिर से छूकर कहती है “जीवेत शरद: शतम्”, तो उस वक्त वह केवल लंबी उम्र नहीं, बल्कि जीवन की गहराई, उसकी गरिमा और उसकी हरियाली की कामना कर रही होती है। वह चाहती है कि उसका बच्चा सिर्फ सांसें न ले, बल्कि भीतर से भी हरा रहे, भीतर से भी ज़िंदा रहे।
आज जब शहरों में लोग हर चीज़ को इंस्टा-स्टोरी और पोस्ट का हिस्सा बना रहे हैं, हरेला अब भी उसी मिट्टी की सादगी में जी रहा है। वह अब भी बिना दिखावे के, बिना तामझाम के, एक छोटी-सी थाली में, खिड़की की धूप में, गमले के कोने में, और मां की ममता में पनपता है।
हरेला हमें सिखाता है कि जड़ से जुड़ना ही असली विकास है। कि हरियाली सिर्फ पेड़ों की नहीं होती रिश्तों की भी होती है, सोच की भी, और आत्मा की भी। आज अगर हम भीतर से बंजर होते जा रहे हैं, तो शायद इसलिए कि हमने हरेला मनाना छोड़ दिया है सिर्फ मिट्टी में नहीं, अपने भीतर भी।
मैंने आज हरेला बोया नहीं, अपने भीतर थोड़ी उम्मीद बोई है। थोड़ी संवेदना, थोड़ा भरोसा, थोड़ा जीवन। और चाहा है कि जैसे वह बीज फूटकर हरियाली देता है, वैसे ही भीतर से भी कुछ टूटे, फूटे, बहे, और फिर एक नई हरियाली जन्म ले।
यही हरेला है…मौन, गहरा, मिट्टी जैसा सच्चा और इस बार, मैंने उसे दिखावे के लिए नहीं…जीने के लिए बोया है। 🌺
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️




