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ग्लेशियर झीलों पर कड़ी निगरानी के निर्देश, भूकम्प पूर्व चेतावनी सिस्टम को और मजबूत करने पर जोर।

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ग्लेशियर झीलों पर कड़ी निगरानी के निर्देश, भूकम्प पूर्व चेतावनी सिस्टम को और मजबूत करने पर जोर।

संवादसूत्र देहरादून: मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने सोमवार को सचिवालय में आपदा प्रबंधन से जुड़ी महत्वपूर्ण परियोजनाओं की समीक्षा करते हुए ग्लेशियर झीलों की प्रभावी निगरानी और भूकम्प पूर्व चेतावनी प्रणाली को और सशक्त बनाने के निर्देश दिए।
बैठक में उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी द्वारा ग्लेशियर झील विस्फोट जोखिम न्यूनीकरण (GLOF) पर प्रगति और भविष्य की कार्ययोजना प्रस्तुत की गई। अधिकारियों ने बताया कि वसुंधरा झील को पायलट साइट के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम और रियल-टाइम मॉनिटरिंग तंत्र स्थापित किए जाएंगे। इस मॉडल को भविष्य में अन्य संवेदनशील झीलों पर भी लागू करने की योजना है।
मुख्य सचिव ने संस्थान को वर्ष 2026-27 और 2027-28 के लिए विस्तृत टाइमलाइन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। साथ ही, झीलों के जल स्तर को नियंत्रित करने, अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने और निर्णय सहायता प्रणाली (Decision Support System) विकसित करने जैसे उपायों को प्राथमिकता देने को कहा।
भूकम्प पूर्व चेतावनी प्रणाली की समीक्षा
दूसरी बैठक में भूकम्प पूर्व चेतावनी प्रणाली (EEWS) की समीक्षा की गई। सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने जानकारी दी कि राज्य में अब तक 169 सेंसर और 112 सायरन स्थापित किए जा चुके हैं। आईआईटी रुड़की के सहयोग से इस प्रणाली को लगातार मजबूत किया जा रहा है।
बताया गया कि 26 फरवरी 2026 को आईआईटी रुड़की के साथ एमओयू हस्ताक्षरित किया गया, जिसके तहत वर्ष 2026 तक अलर्ट प्रसारण, संचालन और अनुरक्षण का कार्य किया जा रहा है। इसके अलावा, राष्ट्रीय भूकम्प जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत 500 स्ट्रॉन्ग मोशन सेंसर और 526 अतिरिक्त सायरन (ईईडब्ल्यूएस एवं मल्टी-हैजार्ड) स्थापित किए जाने का प्रस्ताव है।
राज्य में भूकम्पीय निगरानी को और सुदृढ़ करने के लिए राष्ट्रीय भूकम्प विज्ञान केंद्र के सहयोग से नई वेधशालाएं स्थापित करने की योजना है। प्रस्तावित स्थानों में रुड़की, देवप्रयाग, कर्णप्रयाग, रामनगर, बागेश्वर, अल्मोड़ा, केदारनाथ और चकराता शामिल हैं।
मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि चेतावनी प्रणाली को अधिक सटीक, त्वरित और जनसुलभ बनाया जाए, ताकि आपदा के समय लोगों तक समय पर सूचना पहुंच सके।
भूस्खलन और डिब्रिस फ्लो पर फोकस
तीसरी बैठक में डिब्रिस फ्लो (मलबा बहाव) से जुड़े जोखिम आकलन पर चर्चा हुई। अधिकारियों ने बताया कि चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिलों में 48 संवेदनशील स्थान चिन्हित किए गए हैं। इन्हें जोखिम के आधार पर उच्च, मध्यम और निम्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।
इस कार्य के लिए विभिन्न संस्थानों—उत्तराखण्ड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र, केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान और उत्तराखण्ड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र—को शामिल करते हुए संयुक्त समिति का गठन किया गया है।
मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि चिन्हित स्थलों पर प्राथमिकता के आधार पर सर्वेक्षण, निगरानी और निवारक कार्य किए जाएं तथा जिला प्रशासन और तकनीकी संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जाए।

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